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मुख्यमंत्री की दौड़ में चोकर साबित हो रहे राव इंद्रजीत सिंह

अब अपनी ही पार्टी में मिल रही अहीरवाल में कड़ी टक्कर

Satyakhabarindia

Satyakhabar, Haryana

Rao Inderjit Singh : प्रदेश की राजनीति में इस समय राव इंद्रजीत सिंह काफी चर्चा में है। सर्दी के इस मौसम में राव इंद्रजीत सिंह ने अपने बयान से राजनीतिक गर्मी पैदा कर दी है। असल में राव इंद्रजीत सिंह अहीरवाल की राजनीति के बड़े नेता हैं। वह लगातार छह बार सांसद बने हैं। पूर्व में कांग्रेस में रहे राव इंद्रजीत सिंह वर्तमान में भाजपा में हैं। वह चार बार हरियाणा के विधायक भी बने।
अपने लंबे राजनीतिक अनुभव के बलबूते वह खुद को मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी समझते हैं, लेकिन अगर हरियाणा की राजनीति की बात की जाए तो उन्हें चोकर कहा जा सकता है जो इतने लंबे राजनीतिक अनुभव के बावजूद मुख्यमंत्री पद पर काबिज नहीं हो पाए हैं।
अहीरवाल की राजनीति में उन्हें ‘राजा जी’ कहकर भी पुकारा जाता है। लेकिन वह हरियाणा के राजा नहीं बन पाए हैं। पिछले कुछ समय से राव इंद्रजीत सिंह के बयान और अहीरवाल की राजनीति में मिल रही उन्हें टक्कर से साफ हो रहा है कि अब वह हरियाणा की अहीरवाल की राजनीति के एकछत्र राजा नहीं हैं।

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अपने तीखे और बेबाक अंदाज़ में राव इंद्रजीत सिंह ने अहीरवाल क्षेत्र के साथ वर्षों से चली आ रही राजनीतिक साजिशों का पर्दाफाश करते हुए कहा कि “भोले-भाले अहीरवाल को कमजोर करने की साजिशें हमेशा से रची जाती रही हैं।” उन्होंने कहा कि पहले कनीना विधानसभा को तोड़ा गया और बाद में साल्हावास विधानसभा को समाप्त कर परिसीमन की आड़ में अहीरवाल क्षेत्र की राजनीतिक ताकत को जान-बूझकर कमजोर किया गया। राव इंद्रजीत सिंह ने सीधे तौर पर इसके लिए पूर्व मुख्यमंत्रियों को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि यह सब एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया गया। उनका कहना है कि यह “परिसीमन नहीं, अहिरवाल को कमजोर करने की चाल थी।” राव इंद्रजीत सिंह ने कहा कि परिसीमन का नाम लेकर अहीरवाल की विधानसभा सीटों की संख्या घटाना लोकतंत्र के साथ सीधा धोखा था। उन्होंने कहा कि जिन लोगों को अहीरवाल की एकजुटता और राजनीतिक समझ से डर लगता था, उन्होंने सत्ता में रहते हुए क्षेत्र की आवाज दबाने का काम किया।

राव इंद्रजीत सिंह ने
चेतावनी भरे लहजे में कहा कि अहिरवाल अब पहले जैसा चुप रहने वाला नहीं है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र की जनता अब अपने अधिकार, सम्मान और राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर पूरी तरह जागरूक हो चुकी है और आने वाले समय में इसका करारा जवाब दिया जाएगा।

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राव इंद्रजीत सिंह के पिता राव बीरेंद्र सिंह 24 मार्च 1967 से लेकर 20 नवंबर 1966 तक 241 दिन हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे हैं। उसे समय उन्होंने अपनी विशाल हरियाणा पार्टी का गठन कर रखा था। उसी के बैनर पर वह पटौदी से विधायक चुने गए थे और हरियाणा के दूसरे मुख्यमंत्री बने थे लेकिन 20 नवंबर को हरियाणा में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। 21 मई 1968 को बंसीलाल हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। पिता के मुख्यमंत्री बनने के 10 साल बाद 1977 में राव इंद्रजीत सिंह ने हरियाणा विधानसभा का पहला चुनाव लड़ा और उसके बाद से वह लगातार कांग्रेस में रहे। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले वह भाजपा में शामिल हुए। तब से वह भाजपा में बने हुए हैं। तीन बार भाजपा और तीन बार कांग्रेस के टिकट पर वह सांसद चुने गए हैं।

पिछले दिनों एक डिनर डिप्लोमेसी को लेकर भी राव इंद्रजीत सिंह चर्चा में आए थे। माना यह जाता था कि वह खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार साबित करने पर लगे हुए हैं। देखना यह होगा कि आने वाले समय में क्या राव इंद्रजीत सिंह अपने इन तीखे बयानों और डिनर डिप्लोमेसी जैसी रणनीति के सहारे क्या नया गुल खिलाते हैं, लेकिन फिलहाल उन्हें अपनी ही पार्टी में हरियाणा में मंत्री राव नरबीर सिंह और पूर्व मंत्री अभय सिंह से कड़ी टक्कर मिल रही है।

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